हाल ही में Google ने अपने नए Willow Quantum Processor के ज़रिए एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है जिसे “Verifiable Quantum Advantage” कहा जा रहा है। यह ऐसा क्षण है जब क्वांटम कंप्यूटर ने क्लासिकल सुपरकंप्यूटर से बेहतर प्रदर्शन किया और वह भी ऐसे परिणामों के साथ जिन्हें सत्यापित (verify) किया जा सकता है।
Quantum Advantage क्या है?

परम्परागत (classical) कंप्यूटर में जानकारी “बिट” (0 या 1) के रूप में स्टोर होती है।
Quantum कंप्यूटर में “क्यूबिट” (qubit) होते हैं, जो 0 और 1 दोनों की स्थिति में एक समय में हो सकते हैं (superposition) और एक से अधिक क्यूबिट आपस में उलझे (entanglement) हो सकते हैं।
जब quantum कंप्यूटर कोई उपयुक्त एल्गोरिद्म चलाता है, तो वो कुछ ऐसे कार्य कर सकते हैं जो क्लासिकल कंप्यूटर के लिए बहुत कठिन या असंभव थे।
“Quantum Advantage” का मतलब है कि क्वांटम सिस्टम ने क्लासिकल सिस्टम की तुलना में स्पष्ट लाभ दिखाया हो यानी कोई ऐसा काम किया हो जो क्लासिकल कंप्यूटर बेहतर या तेज़ नहीं कर सकते।
Google ने कहा है कि उन्होंने पहली-बार “verifiable quantum advantage” प्राप्त किया है यानी परिणाम इस तरह से मिले हैं कि उन्हें दोहराया या सत्यापित किया जा सकता है।
Google ने अब क्या कर दिखाया है?
Google के Willow नाम के 105-क्यूबिट सुपरकंडक्टिंग क्वांटम प्रोसेसर पर उन्होंने एक नए एल्गोरिद्म Quantum Echoes चलाया है, जिसे उन्होंने Nature में प्रकाशित किया है।
उन्होंने दावा किया है कि इस एल्गोरिद्म ने क्लासिकल सुपरकंप्यूटर की तुलना में लगभग 13,000 गुना तेज़ी से काम किया।
यह एल्गोरिद्म विशेष रूप से “Out-of-Time-Ordered Correlator” (OTOC) नामक क्वांटम माप को मापने के लिए बनाया गया है, जो क्वांटम सिस्टम के “हल्ला-हंगामा” (quantum chaos) को समझने में मदद करता है।
क्यों यह महत्वपूर्ण है?
अगर क्वांटम कंप्यूटर ऐसे कार्य करने लग जाएँ जो क्लासिकल कंप्यूटर नहीं कर सकते, तो यह विज्ञान, इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी में बड़े बदलाव ला सकता है — जैसे नई दवाओं की खोज, बेहतर बैटरियाँ, सामग्री-अनुसंधान आदि।
Google का कहना है कि यह “उपयोगी क्वांटम कंप्यूटिंग” की दिशा में एक मील का पत्थर (milestone) है अर्थात् कब-तक क्वांटम सिस्टम सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित रहेंगे, और कब-तक व्यावहारिक बनी चीजों में प्रवेश करेंगे।
विश्वस्तरीय कंपनियाँ व देश इस क्षेत्र में तेजी से निवेश कर रहे हैं इसलिए यह टेक्नो-जंग भी बना हुआ है।
Challenges:
भले ही यह एक बड़ा कदम है, पूरा समाधान नहीं मिल गया है। अभी कई तकनीकी बाधाएँ हैं:
क्यूबिट्स बहुत संवेदनशील होते हैं – “त्रुटि दर” (error-rate) अभी भी काफी है।
Fault-tolerant quantum computer (जिसमें त्रुटियों को नियंत्रित करके लाखों-करोड़ों क्यूबिट्स का इस्तेमाल हो सके) अभी दूर है। Google खुद कहता है कि अगला लक्ष्य “long-lived logical qubit” बनाना है।
यह दावे अभी विशिष्ट कार्यों तक सीमित हैं — यानी यह तरीका हर तरह के समस्या के लिए नहीं है।
“Quantum advantage” का दावा होने के बाद भी, वास्तव में व्यावसायिक, बड़े-पैमाने पर उपयोग में अभी वक्त लग सकता है।
साइबर सुरक्षा के संदर्भ में भी जैसे क्वांटम कंप्यूटर भविष्य में एन्क्रिप्शन को तोड़ने में सक्षम हो सकते हैं, इसलिए “post-quantum cryptography” की जरूरत भी बढ़ जाएगी।
- Google ने क्वांटम कंप्यूटर में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार किया है “पहला सत्यापित (verifiable) quantum advantage” का दावा है।
- इसका मतलब है कि क्वांटम सिस्टम अब “हाथ में आने योग्य” दिशा में आगे बढ़ रहा है, सिर्फ शोधशाला तक सीमित नहीं रह रहा।
- फिर भी हम क्वांटम कंप्यूटर के व्यवसाय-स्तर उपयोग (commercial scale) के बहुत पास नहीं हैं; अभी और काम बाकी है।
- आने वाले सालों में यह देखने योग्य होगा कि इस तरह की तकनीक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में (जैसे दवाइयाँ, ऊर्जा, सामग्री) कब-तक पहुँचती है।
Quantum जानकारी “Hide” कैसे है?
क्वांटम दुनिया में जानकारी (information) कणों जैसे इलेक्ट्रॉन या फोटॉन की क्वांटम अवस्था (quantum state) में छिपी होती है।
इन अवस्थाओं में कुछ विशेषताएँ होती हैं:
Superposition: एक कण एक साथ कई अवस्थाओं में हो सकता है (जैसे एक सिक्का हवा में घूमते समय एक साथ “हेड” और “टेल” दोनों हो)।
Entanglement (उलझाव): दो या ज़्यादा कण इस तरह जुड़ जाते हैं कि अगर एक की अवस्था बदली, तो दूसरे की भी तुरंत बदल जाती है चाहे वो दूर ही क्यों न हों।
जब बहुत सारे कण एक साथ इंटरैक्ट करते हैं (यानि एक complex quantum system बनता है), तो उनकी व्यक्तिगत अवस्थाएँ आपस में इतनी उलझ जाती हैं कि हमें “बाहरी दृष्टि” से यह पता नहीं चलता कि जानकारी कहाँ गई।
यह जानकारी गायब नहीं होती — बस सिस्टम की जटिल उलझनों (entanglements) में “छिप” जाती है।
Quantum कंप्यूटर इसे “find” कैसे पाता है?
क्लासिकल कंप्यूटर ऐसी उलझी जानकारी को “रीवर्स” नहीं कर पाते क्योंकि वे एक समय में केवल एक अवस्था देख सकते हैं।
लेकिन एक क्वांटम कंप्यूटर:
खुद “क्वांटम सिद्धांत” पर आधारित होता है।
यह उन उलझी हुई अवस्थाओं को समानांतर (parallel) रूप में प्रोसेस कर सकता है।
यानी यह “समय को उल्टा घुमाने” जैसा एल्गोरिद्म चला सकता है जिससे छिपी जानकारी वापस निकाली जा सके।
Example:
Google का नया Quantum Echoes algorithm यही काम करता है- यह पहले क्वांटम सिस्टम में जानकारी “बिखेरता” है और फिर उसे “वापस लाकर” जांचता है कि क्या क्वांटम कंप्यूटर वास्तव में छिपी जानकारी को पुनः प्राप्त कर सकता है।
अगर यह सफल होता है, तो इसका मतलब है कि क्वांटम कंप्यूटर ने वास्तव में उस जटिल उलझन को समझकर जानकारी को रिकवर (retrieve) किया है।
इसका वास्तविक दुनिया में क्या उपयोग है?
यह क्षमता बहुत शक्तिशाली है क्योंकि प्रकृति में कई प्रणालियाँ (systems) खुद ऐसी जटिल क्वांटम उलझनों पर आधारित हैं।
- नई दवाओं की खोज (Drug Discovery):
अणुओं में इलेक्ट्रॉनों की क्वांटम अवस्थाओं को समझकर यह पता लगाया जा सकता है कि कौन सी दवा किस रोग के साथ कैसे प्रतिक्रिया करेगी। - नए पदार्थ (Materials) और सुपरकंडक्टर डिज़ाइन:
जटिल मटेरियल्स में इलेक्ट्रॉनों का व्यवहार बहुत उलझा होता है — क्वांटम कंप्यूटर इसे सटीक रूप से मॉडल कर सकते हैं। - जलवायु या प्लाज़्मा सिमुलेशन:
बड़ी प्रणालियों में ऊर्जा और सूचना का प्रवाह समझने में मदद। - Quantum Communication / Encryption:
क्वांटम स्तर पर डेटा सुरक्षित रखने और ट्रांसफर करने की नई तकनीकें विकसित करना।
Google ने Quantum Echoes Algorithm के ज़रिए सत्यापित Quantum Advantage हासिल किया है। यह इस बात का संकेत है कि क्वांटम कंप्यूटिंग अब प्रयोगशाला से निकलकर वास्तविक उपयोग की दिशा में बढ़ रही है। आने वाले वर्षों में यह तकनीक दवा-निर्माण, ऊर्जा, और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला सकती है फिलहाल यह शुरुआत है, लेकिन एक ऐसी शुरुआत जो भविष्य के सुपर-कंप्यूटिंग युग की नींव रख सकती है।